Ambala Police
Haryana

क्या भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 7 में कार्रवाई हेतु पुलिस इंपेक्टर भी सक्षम ?

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आम तौर पर मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने को मिलता है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों या क्षेत्र में पुलिस /राज्य चौकसी ब्यूरो द्वारा छापा मारकर रिश्वत लेते हेतु भ्रष्ट सरकारी अधिकारी/कर्मचारी को रंगे हाथों पकड़ा गया है हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि क्या ऐसी कार्रवाही हेतु विशेष तौर पर पुलिस इंस्पेक्टर को प्राधिकृत किया गया अथवा नहीं । एडवोकेट हेमंत ने बताया कि अगर राज्य सरकार द्वारा जारी उपरोक्त प्राधिकृत आदेश के बिना कोई पुलिस इंस्पेक्टर ऐसी कार्रवाई करता है, तो इस आधार पर भ्रष्ट अधिकारी/कर्मचारी के विरूद्ध डाली गई रेड/कार्रवाई की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठ सकता है एवं उसे अदालत से राहत भी प्राप्त हो सकती है।

भारत देश की संसद द्वारा बनाये गए एवं आज से 34 वर्ष पूर्व सितम्बर 1988 से देश में लागू भ्रष्टाचार निवारण कानून (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन-पीसी एक्ट),1988 की धारा 17 के अंतर्गत, जो इस कानून के अंतर्गत दर्ज मामलों के अन्वेषण (इन्वेस्टीगेशन) हेतु पुलिस अधिकारियों को प्राधिकृत करने से सम्बंधित है, में स्पष्ट तौर पर उल्लेख है कि दंड प्रकिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 में किसी बात के होते हुए भी, जहां तक सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) का विषय है, तो पुलिस निरीक्षक (इंस्पेक्टर) रैक से नीचे का पुलिस अधिकारी, जहाँ तक देश के महानगरों एवं ऐसे क्षेत्र जिन्हे सीआरपीसी की धारा 8 (1) में महानगरीय क्षेत्र के तौर पर नोटिफाई किया गया हो जैसे हरियाणा में पंचकुला, गुरुग्राम और फरीदाबाद जिलों में, यहां एसीपी (अस्सिटेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस- सहायक पुलिस आयुक्त) रैक से नीचे का पुलिस अधिकारी और अन्य स्थानों/क्षेत्रों में डीएसपी ( उप पुलिस अधीक्षक) रैक से नीचे का पुलिस अधिकारी , उक्त कानून के अंतर्गत किसी दंडनीय अपराध का अन्वेषण मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना एवं बगैर वारंट के इस सम्बन्ध में कोई गिरफ्तारी नहीं करेगा ।

इसी बीच शहर निवासी एवं पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने सिटी मीडिया, अंबाला से बात करते हुए बताया कि उपरोक्त 1988 कानून की धारा 17 में हालांकि यह भी शापधान है कि प्रदेश सरकार ऐसे पुलिस अधिकारी, जो पुलिस इंस्पेक्टर से नीचे रेंक का न हो, को सामान्य या विशेष आदेश के द्वारा इस सम्बन्ध में प्राधिकृत कर सकती है ताकि वह भी इस धारा के अंतर्गत उपरोक्त कानून के अंतर्गत किसी दंडनीय अपराध का अन्वेषण बगैर मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के एवं बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सके। अब चूँकि इस सम्बन्ध में हरियाणा सरकार द्वारा उपरोक्त सम्बन्ध में आज तक ना ही ऐसे किसी सामान्य या विशेष आदेश की प्रति सार्वजनिक नहीं है अर्थात प्रदेश पुलिस की या स्टेट विजिलेंस ब्यूरो आदि की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है, इसलिए हेमंत ने प्रदेश के मुख्य सचिव, जो विजिलेंस (चौकनी) के भी प्रशासनिक सचिव और स्टेट विजिलस ब्यूरो के महानिदेशक आदि को पत्र लिखकर उनसे इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण स्पष्ट करवाने की अपील की है. उन्होंने इस सम्बन्ध में प्रदेश

सरकार द्वारा जारी सामान्य आदेश, अगर आज तक ऐसा किया गया है, का सार्वजनिक प्रकटीकरण (पब्लिक डिस्क्लोजर) करने की भी मांग की है।

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